मलेरिया

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मलेरिया
वर्गीकरण एवं बाह्य साधन
मानव रक्त में प्लास्मोडियम फैल्सीपैरम वलय-रूप तथा gametocytes.
ICD-10 B50.
ICD-9 084
OMIM 248310
DiseasesDB 7728
MedlinePlus 000621
eMedicine med/1385  emerg/305 ped/1357
MeSH C03.752.250.552

मलेरिया एक वाहक-जनित संक्रामक रोग है जो प्रोटोज़ोआ परजीवी द्वारा फैलता है। यह मुख्य रूप से अमेरिका, एशिया और अफ्रीका महाद्वीपों के उष्ण तथा उपोष्ण कटिबंधी क्षेत्रों में फैला हुआ है। प्रत्येक वर्ष यह 51.5 करोड़ लोगों को प्रभावित करता है तथा 10 से 30 लाख लोगों की मृत्यु का कारण बनता है जिनमें से अधिकतर उप-सहारा अफ्रीका के युवा बच्चे होते हैं।[१] मलेरिया को आमतौर पर गरीबी से जोड़ कर देखा जाता है किंतु यह खुद अपने आप में गरीबी का कारण है तथा आर्थिक विकास का प्रमुख अवरोधक है।

मलेरिया सबसे प्रचलित संक्रामक रोगों में से एक है तथा भंयकर जन स्वास्थ्य समस्या है। यह रोग प्लास्मोडियम गण के प्रोटोज़ोआ परजीवी के माध्यम से फैलता है। केवल चार प्रकार के प्लास्मोडियम (Plasmodium) परजीवी मनुष्य को प्रभावित करते है जिनमें से सर्वाधिक खतरनाक प्लास्मोडियम फैल्सीपैरम (Plasmodium falciparum) तथा प्लास्मोडियम विवैक्स (Plasmodium vivax) माने जाते हैं, साथ ही प्लास्मोडियम ओवेल (Plasmodium ovale) तथा प्लास्मोडियम मलेरिये (Plasmodium malariae) भी मानव को प्रभावित करते हैं। इस सारे समूह को 'मलेरिया परजीवी' कहते हैं।

मलेरिया के परजीवी का वाहक मादा एनोफ़िलेज़ (Anopheles) मच्छर है। इसके काटने पर मलेरिया के परजीवी लाल रक्त कोशिकाओं में प्रवेश कर के बहुगुणित होते हैं जिससे रक्तहीनता (एनीमिया) के लक्षण उभरते हैं (चक्कर आना, साँस फूलना, द्रुतनाड़ी इत्यादि) । इसके अलावा अविशिष्ट लक्षण जैसे कि बुखार, सर्दी, उबकाई, और जुखाम जैसी अनुभूति भी देखे जाते हैं। गंभीर मामलों में मरीज मूर्च्छा में जा सकता है और मृत्यु भी हो सकती है।

मलेरिया के फैलाव को रोकने के लिए कई उपाय किये जा सकते हैं। मच्छरदानी और कीड़े भगाने वाली दवाएं मच्छर काटने से बचाती हैं, तो कीटनाशक दवा के छिडकाव तथा स्थिर जल (जिस पर मच्छर अण्डे देते हैं) की निकासी से मच्छरों का नियंत्रण किया जाता सकता है। मलेरिया की रोकथाम के लिये यद्यपि टीके/वैक्सीन पर शोध जारी है, लेकिन अभी तक कोई उपलब्ध नहीं हो सका है। मलेरिया से बचने के लिए निरोधक दवाएं लम्बे समय तक लेनी पडती हैं और इतनी महंगी होती हैं कि मलेरिया प्रभावित लोगों की पहुँच से अक्सर बाहर होती है। मलेरिया प्रभावी इलाके के ज्यादातर वयस्क लोगों मे बार-बार मलेरिया होने की प्रवृत्ति होती है साथ ही उनमें इस के विरूद्ध आंशिक प्रतिरोधक क्षमता भी आ जाती है, किंतु यह प्रतिरोधक क्षमता उस समय कम हो जाती है जब वे ऐसे क्षेत्र मे चले जाते है जो मलेरिया से प्रभावित नहीं हो। यदि वे प्रभावित क्षेत्र मे वापस लौटते हैं तो उन्हे फिर से पूर्ण सावधानी बरतनी चाहिए। मलेरिया संक्रमण का इलाज कुनैन या आर्टिमीसिनिन जैसी मलेरियारोधी दवाओं से किया जाता है यद्यपि दवा प्रतिरोधकता के मामले तेजी से सामान्य होते जा रहे हैं।

अनुक्रम

[संपादित करें] इतिहास

चार्ल्स लुई अल्फोंस लैवेरन
चार्ल्स लुई अल्फोंस लैवेरन

मलेरिया मानव को 50,000 वर्षों से प्रभावित कर रहा है शायद यह सदैव से मनुष्य जाति पर परजीवी रहा है।[२] इस परजीवी के निकटवर्ती रिश्तेदार हमारे निकटवर्ती रिश्तेदारों मे यानि चिम्पांज़ी मे रहते हैं।[३] जब से इतिहास लिखा जा रहा है तबसे मलेरिया के वर्णन मिलते हैं। सबसे पुराना वर्णन चीन से 2700 ईसा पूर्व का मिलता है।[४] मलेरिया शब्द की उत्पत्ति मध्यकालीन इटालियन भाषा के शब्दों माला एरिया से हुई है जिनका अर्थ है 'बुरी हवा'। इसे 'दलदली बुखार' (अंग्रेजी: marsh fever, मार्श फ़ीवर) या 'एग' (अंग्रेजी: ague) भी कहा जाता था क्योंकि यह दलदली क्षेत्रों में व्यापक रूप से फैलता था।

मलेरिया पर पहले पहल गंभीर वैज्ञानिक अध्ययन 1880 मे हुआ था जब एक फ़्रांसीसी सैन्य चिकित्सक चार्ल्स लुई अल्फोंस लैवेरन ने अल्जीरिया में काम करते हुए पहली बार लाल रक्त कोशिका के अन्दर परजीवी को देखा था। तब उसने यह प्रस्तावित किया कि मलेरिया रोग का कारण यह प्रोटोज़ोआ परजीवी है।[५] इस तथा अन्य खोजों हेतु उसे 1907 का चिकित्सा नोबेल पुरस्कार दिया गया।

इस प्रोटोज़ोआ का नाम प्लास्मोडियम इटालियन वैज्ञानिकों एत्तोरे मार्चियाफावा तथा आंजेलो सेली ने रखा था।[६] इसके एक वर्ष बाद क्युबाई चिकित्सक कार्लोस फिनले ने पीत ज्वर का इलाज करते हुए पहली बार यह दावा किया कि मच्छर रोग को एक मनुष्य से दूसरे मनुष्य तक फैलाते हैं। किंतु इसे अकाट्य रूप प्रमाणित करने का कार्य ब्रिटेन के सर रोनाल्ड रॉस ने सिकंदराबाद में काम करते हुए 1898 में किया था। इन्होंने मच्छरों की विशेष जातियों से पक्षियों को कटवा कर उन मच्छरों की लार ग्रंथियों से परजीवी अलग कर के दिखाया जिन्हे उन्होंने संक्रमित पक्षियों में पाला था।[७] इस कार्य हेतु उन्हे 1902 का चिकित्सा नोबेल मिला। बाद में भारतीय चिकित्सा सेवा से त्यागपत्र देकर रॉस ने नवस्थापित लिवरपूल स्कूल ऑफ़ ट्रॉपिकल मेडिसिन में कार्य किया तथा मिस्र, पनामा, यूनान तथा मारीशस जैसे कई देशों मे मलेरिया नियंत्रण कार्यों मे योगदान दिया।[८] फिनले तथा रॉस की खोजों की पुष्टि वाल्टर रीड की अध्यक्षता में एक चिकित्सकीय बोर्ड ने 1900 में की। इसकी सलाहों का पालन विलियम सी. गोर्गस ने पनामा नहर के निर्माण के समय किया, जिसके चलते हजारों मजदूरों की जान बच सकी. इन उपायों का प्रयोग भविष्य़ मे इस बीमारी के विरूद्ध किया गया।

सर रोनल्ड रॉस
सर रोनल्ड रॉस

मलेरिया के विरूद्ध पहला प्रभावी उपचार सिनकोना वृक्ष की छाल से किया गया था जिसमें कुनैन पाई जाती है। यह वृक्ष पेरु देश में एण्डीज़ पर्वतों की ढलानों पर उगता है। इस छाल का प्रयोग स्थानीय लोग लम्बे समय से मलेरिया के विरूद्ध करते रहे थे। जीसुइट पादरियों ने करीब 1640 इस्वी में यह इलाज यूरोप पहुँचा दिया, जहाँ यह बहुत लोकप्रिय हुआ।[९] परन्तु छाल से कुनैन को 1820 तक अलग नहीं किया जा सका। यह कार्य अंततः फ़्रांसीसी रसायनविदों पियेर जोसेफ पेलेतिये तथा जोसेफ बियाँनेमे कैवेंतु ने किया था, इन्होंने ही कुनैन को यह नाम दिया।[१०]

बीसवीं सदी के प्रारंभ में, एन्टीबायोटिक दवाओं के अभाव में, उपदंश (सिफिलिस) के रोगियों को जान बूझ कर मलेरिया से संक्रमित किया जाता था। इसके बाद कुनैन देने से मलेरिया और उपदंश दोनों काबू में आ जाते थे। यद्यपि कुछ मरीजों की मृत्यु मलेरिया से हो जाती थी, उपदंश से होने वाली निश्चित मृत्यु से यह नितांत बेहतर माना जाता था।[११]

यधपि मलेरिया परजीवी के जीवन के रक्त चरण और मच्छर चरण का पता बहुत पहले लग गया था, किंतु यह 1980 मे जा कर पता लगा कि यह यकृत मे छिपे रूप से मौजूद रह सकता है।[१२][१३] इस खोज से यह गुत्थी सुलझी कि क्यों मलेरिया से उबरे मरीज वर्षों बाद अचानक रोग से ग्रस्त हो जाते हैं।

[संपादित करें] रोग का वितरण तथा प्रभाव

विश्व के वे क्षेत्र जहाँ मलेरिया महामारी बना हुआ है (नीले रंग में)।
विश्व के वे क्षेत्र जहाँ मलेरिया महामारी बना हुआ है (नीले रंग में)।[१४]

मलेरिया प्रतिवर्ष 40 से 90 करोड़ बुखार के मामलो का कारण बनता है, वहीं इससे 10 से 30 लाख मौतेँ हर साल होती हैं,[१५][१६] जिसका अर्थ है प्रति 30 सैकेण्ड में एक मौत। इनमें से ज्यादातर पाँच वर्ष से कम आयु वाले बच्चें होते हैं,[१७] वहीं गर्भवती महिलाएँ भी इस रोग के प्रति संवेदनशील होती हैं। संक्रमण रोकने के प्रयास तथा इलाज करने के प्रयासों के होते हुए भी 1992 के बाद इसके मामलों में अभी तक कोई गिरावट नहीं आयी है।[१८] यदि मलेरिया की वर्तमान प्रसार दर बनीं रही तो अगले 20 वर्षों मे मृत्यु दर दोगुणी हो सकती है।[१५] मलेरिया के बारे में वास्तविक आकँडे अनुपल्ब्ध हैं क्योंकि ज्यादातर रोगी ग्रामीण इलाकों मे रहते हैं, ना तो वे चिकित्सालय जाते हैं और ना उनके मामलों का लेखा जोखा रखा जाता है।[१५]

मलेरिया और एच.आई.वी. का एक साथ संक्रमण होने से मृत्यु की संभावना बढ़ जाती है। मलेरिया चूंकि एच.आई.वी. से अलग आयु-वर्ग में होता है, इसलिए यह मेल एच.आई.वी. - टी.बी. (क्षय रोग) के मेल से कम व्यापक और घातक होता है।[१९] तथापि ये दोनो रोग एक दूसरे के प्रसार को फैलाने मे योगदान देते हैं- मलेरिया से वायरल भार बढ जाता है, वहीं एड्स संक्रमण से व्यक्ति की प्रतिरोधक क्षमता कमजोर हो जाने से वह रोग की चपेट मे आ जाता है।[२०]

वर्तमान में मलेरिया भूमध्य रेखा के दोनों तरफ विस्तृत क्षेत्र में फैला हुआ है इन क्षेत्रों में अमेरिका, एशिया तथा ज्यादातर अफ्रीका आता है, लेकिन इनमें से सबसे ज्यादा मौते (लगभग 85 से 90 % तक) उप-सहारा अफ्रीका मे होती हैं।[२१] मलेरिया का वितरण समझना थोडा जटिल है, मलेरिया प्रभावित तथा मलेरिया मुक्त क्षेत्र प्राय साथ साथ होते हैं।[२२] सूखे क्षेत्रों में इसके प्रसार का वर्षा की मात्रा से गहरा संबंध है।[२३] डेंगू बुखार के विपरीत यह शहरों की अपेक्षा गाँवों में ज्यादा फैलता है।[२४] उदाहरणार्थ वियतनाम, लाओस और कम्बोडिया के नगर मलेरिया मुक्त हैं, जबकि इन देशों के गाँव इस से पीडित हैं।[२५] अपवाद-स्वरूप अफ्रीका में नगर-ग्रामीण सभी क्षेत्र इस से ग्रस्त हैं, यद्यपि बड़े नगरों में खतरा कम रहता है।.[२६] 1960 के दशक के बाद से कभी इसके विश्व वितरण को मापा नहीं गया है। हाल ही में ब्रिटेन की वेलकम ट्रस्ट ने मलेरिया एटलस परियोजना को इस कार्य हेतु वित्तीय सहायता दी है, जिससे मलेरिया के वर्तमान तथा भविष्य के वितरण का बेहतर ढँग से अध्ययन किया जा सकेगा।[२७]

[संपादित करें] सामाजिक एवं आर्थिक प्रभाव

मलेरिया गरीबी से जुड़ा तो है ही, यह अपने आप में खुद गरीबी का कारण है तथा आर्थिक विकास में बाधक है। जिन क्षेत्रों में यह व्यापक रूप से फैलता है वहाँ यह अनेक प्रकार के नकारात्मक आर्थिक प्रभाव डालता है। प्रति व्यक्ति जी.डी.पी की तुलना यदि 1995 के आधार पर करें (खरीद क्षमता को समायोजित करके), तो मलेरिया मुक्त क्षेत्रों और मलेरिया प्रभावित क्षेत्रों में इसमें पाँच गुणा का अंतर नजर आता है (1,526 डालर बनाम 8,268 डालर)। जिन देशों मे मलेरिया फैलता है उनके जी.डी.पी मे 1965 से 1990 के मध्य केवल प्रतिवर्ष 0.4% की वृद्धि हुई वहीं मलेरिया से मुक्त देशों में यह 2.4% हुई।[२८] यद्यपि साथ में होने भर से ही गरीबी और मलेरिया के बीच कारण का संबंध नहीं जोड़ा सकता है, बहुत से गरीब देशों में मलेरिया की रोकथाम करने के लिए पर्याप्त धन उपलब्ध नहीं हो पाता है। केवल अफ्रीका में ही प्रतिवर्ष 12 अरब अमेरिकन डालर का नुकसान मलेरिया के चलते होता है, इसमें स्वास्थ्य व्यय, कार्यदिवसों की हानि, शिक्षा की हानि, दिमागी मलेरिया के चलते मानसिक क्षमता की हानि तथा निवेश एवं पर्यटन की हानि शामिल हैं।[१७] कुछ देशों मे यह कुल जन स्वास्थय बजट का 40% तक खा जाता है। इन देशों में अस्पतालों में भर्ती होने वाले मरीजों में से 30 से 50% और बाह्य-रोगी विभागों में देखे जाने वाले रोगियों में से 50% तक रोगी मलेरिया के होते हैं।[२९]

[संपादित करें] रोग के लक्षण

मलेरिया के लक्षणों में शामिल हैं- ज्वर, कंपकंपी, जोड़ों में दर्द, उल्टी, रक्ताल्पता (रक्त विनाश से), मूत्र में हीमोग्लोबिन और दौरे। मलेरिया का सबसे आम लक्षण है अचानक तेज कंपकंपी के साथ शीत लगना, जिसके फौरन बाद ज्वर आता है। 4 से 6 घंटे के बाद ज्वर उतरता है और पसीना आता है। पी. फैल्सीपैरम के संक्रमण में यह पूरी प्रक्रिया हर 36 से 48 घंटे में होती है या लगातार ज्वर रह सकता है; पी. विवैक्स और पी. ओवेल से होने वाले मलेरिया में हर दो दिन में ज्वर आता है, तथा पी. मलेरिये से हर तीन दिन में।[३०]

मलेरिया के गंभीर मामले लगभग हमेशा पी. फैल्सीपैरम से होते हैं। यह संक्रमण के 6 से 14 दिन बाद होता है।[३१] तिल्ली और यकृत का आकार बढ़ना, तीव्र सिरदर्द और अधोमधुरक्तता (रक्त में ग्लूकोज़ की कमी) भी अन्य गंभीर लक्षण हैं। मूत्र में हीमोग्लोबिन का उत्सर्जन, और इससे गुर्दों की विफलता तक हो सकती है, जिसे कालापानी बुखार (अंग्रेजी: #FFFFFFwater fever, ब्लैक वाटर फ़ीवर) कहते हैं। गंभीर मलेरिया से मूर्च्छा या मृत्यु भी हो सकती है, युवा बच्चे तथा गर्भवती महिलाओं मे ऐसा होने का खतरा बहुत ज्यादा होता है। अत्यंत गंभीर मामलों में मृत्यु कुछ घंटों तक में हो सकती है।[३१] गंभीर मामलों में उचित इलाज होने पर भी मृत्यु दर 20% तक हो सकती है।[३२] महामारी वाले क्षेत्र मे प्राय उपचार संतोषजनक नहीं हो पाता, अतः मृत्यु दर काफी ऊँची होती है, और मलेरिया के प्रत्येक 10 मरीजों में से 1 मृत्यु को प्राप्त होता है।[३३]

मलेरिया युवा बच्चों के विकासशील मस्तिष्क को गंभीर क्षति पहुंचा सकता है। बच्चों में दिमागी मलेरिया होने की संभावना अधिक रहती है, और ऐसा होने पर दिमाग में रक्त की आपूर्ति कम हो सकती है, और अक्सर मस्तिष्क को सीधे भी हानि पहुँचाती है।[३४] अत्यधिक क्षति होने पर हाथ-पांव अजीब तरह से मुड़-तुड़ जाते हैं।[३५] दीर्घ काल में गंभीर मलेरिया से उबरे बच्चों में अकसर अल्प मानसिक विकास देखा जाता है।[३६]

गर्भवती स्त्रियाँ मच्छरों के लिए बहुत आकर्षक होती हैं,[३७] और मलेरिया से गर्भ की मृत्यु, निम्न जन्म भार और शिशु की मृत्यु तक हो सकते हैं।[३८] मुख्यतया यह पी. फ़ैल्सीपैरम के संक्रमण से होता है, लेकिन पी. विवैक्स भी ऐसा कर सकता है।[३९]

पी. विवैक्स तथा पी. ओवेल परजीवी वर्षों तक यकृत मे छुपे रह सकते हैं। अतः रक्त से रोग मिट जाने पर भी रोग से पूर्णतया मुक्ति मिल गई है ऐसा मान लेना गलत है। पी. विवैक्स मे संक्रमण के 30 साल बाद तक फिर से मलेरिया हो सकता है।[३१] समशीतोष्ण क्षेत्रों में पी. विवैक्स के हर पाँच मे से एक मामला ठंड के मौसम में छुपा रह कर अगले साल अचानक उभरता है।[४०]

[संपादित करें] कारक

[संपादित करें] मलेरिया परजीवी

मलेरिया प्लास्मोडियम गण के प्रोटोज़ोआ परजीवियों से फैलता है। इस गण के चार सदस्य मनुष्यों को संक्रमित करते हैं- प्लास्मोडियम फैल्सीपैरम, प्लास्मोडियम विवैक्स, प्लास्मोडियम ओवेल तथा प्लास्मोडियम मलेरिये। इनमें से सर्वाधिक खतरनाक पी. फैल्सीपैरम माना जाता है, यह मलेरिया के 80 प्रतिशत मामलों और 90 प्रतिशत मृत्युओं के लिए जिम्मेदार होता है। [४१] यह परजीवी पक्षियों, रेँगने वाले जीवों, बन्दरों, चिम्पांज़ियों तथा चूहों को भी संक्रमित करता है।[४२] कई अन्य प्रकार के प्लास्मोडियम से भी मनुष्य में संक्रमण ज्ञात हैं किंतु पी. नाउलेसी (P. knowlesi) के अलावा यह नगण्य हैं।[४३] पक्षियों में पाए जाने वाले मलेरिया से मुर्गियाँ मर सकती हैं लेकिन इससे मुर्गी-पालकों को अधिक नुकसान होता नहीं पाया गया है।[४४] हवाई द्वीप समूह में जब मनुष्य के साथ यह रोग पहुँचा तो वहाँ की कई पक्षी प्रजातियाँ इससे विनष्ट हो गयीं क्योंकि इसके विरूद्ध कोई प्राकृतिक प्रतिरोध क्षमता उनमें नहीं थी । .[४५]

मलेरिया फैलाने वाली मादा एनोफ़िलीज़ मच्छर
मलेरिया फैलाने वाली मादा एनोफ़िलीज़ मच्छर

[संपादित करें] मच्छर

मलेरिया परजीवी की प्राथमिक पोषक मादा एनोफ़िलीज़ मच्छर होती है, जोकि मलेरिया का संक्रमण फैलाने में भी मदद करती है। एनोफ़िलीज़ गण के मच्छर सारे संसार में फैले हुए हैं। केवल मादा मच्छर खून से पोषण लेती है, अतः यह ही वाहक होती है ना कि नर। मादा मच्छर एनोफ़िलीज़ रात को ही काटती है। शाम होते ही यह शिकार की तलाश मे निकल पडती है तथा तब तक घूमती है जब तक शिकार मिल नहीं जाता। यह खड़े पानी के अन्दर अंडे देती है। अंडों, और उनसे निकलने वाले लारवा दोनों को पानी की अत्यंत सख्त जरुरत होती है। इसके अतिरिक्त लारवा को सांस लेने के लिए पानी की सतह पर बार-बार आना पड़ता है। अंडे-लारवा-प्यूपा और फिर वयस्क होने में मच्छर लगभग 10-14 दिन का समय लेते हैं। वयस्क मच्छर पराग और शर्करा वाले अन्य भोज्य-पदार्थों पर पलते हैं, लेकिन मादा मच्छर को अंडे देने के लिए रक्त की आवश्यकता होती है।

प्लास्मोडियम परजीवी, मलेरिया फैलाने वाले मच्छर की मध्य-अंतड़ी की अन्दरूनी परत की कोशिका के कोशिकाद्रव्य का संक्रमण करते हुए, इलैक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी से चित्रित।
प्लास्मोडियम परजीवी, मलेरिया फैलाने वाले मच्छर की मध्य-अंतड़ी की अन्दरूनी परत की कोशिका के कोशिकाद्रव्य का संक्रमण करते हुए, इलैक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी से चित्रित।

[संपादित करें] प्लास्मोडियम का जीवन चक्र

मलेरिया परजीवी का पहला शिकार तथा वाहक मादा एनोफ़िलीज़ मच्छर बनती है। युवा मच्छर संक्रमित मानव को काटने पर उसके रक्त से मलेरिया परजीवी को ग्रहण कर लेते हैं। रक्त में मौजूद परजीवी के जननाणु (अंग्रेजी:gametocytes, गैमीटोसाइट्स) मच्छर के पेट में नर और मादा के रूप में विकसित हो जाते हैं और फिर मिलकर अंडाणु (अंग्रेजी:oocytes, ऊसाइट्स) बना लेते हैं जो मच्छर की अंतड़ियों की दीवार में पलने लगते हैं। परिपक्व होने पर ये फूटते हैं, और इसमें से निकलने वाले बीजाणु (अंग्रेजी:sporozoites, स्पोरोज़ॉट्स) उस मच्छर की लार-ग्रंथियों में पहुँच जाते हैं। मच्छर फिर जब स्वस्थ मनुष्य को काटता है तो त्वचा में लार के साथ-साथ बीजाणु भी भेज देता है।[४६] मानव शरीर में ये बीजाणु फिर पलकर जननाणु बनाते हैं (नीचे देखें), जो फिर आगे संक्रमण फैलाते हैं।

इसके अलावा मलेरिया संक्रमित रक्त को चढ़ाने से भी फैल सकता है, लेकिन ऐसा होना बहुत असाधारण है।[४७]

[संपादित करें] मानव शरीर में रोग का विकास

मलेरिया परजीवी का मानव में विकास दो चरणों में होता है: यकृत में प्रथम चरण, और लाल रक्त कोशिकाओं में दूसरा चरण। जब एक संक्रमित मच्छर मानव को काटता है तो बीजाणु (अंग्रेजी: sporozoites, स्पोरोज़ॉइट्स) मानव रक्त में प्रवेश कर यकृत में पहुँचते हैं और शरीर में प्रवेश पाने के 30 मिनट के भीतर यकृत की कोशिकाओं को संक्रमित कर देते हैं। फिर ये यकृत में अलैंगिक जनन करने लगते हैं। यह चरण 6 से 15 दिन चलता है। इस जनन से हजारों अंशाणु (अंग्रेजी: merozoites, मीरोज़ॉइट्स) बनते हैं जो अपनी मेहमान कोशिकाओं को तोड़ कर रक्त में प्रवेश कर जातें हैं तथा लाल रक्त कोशिकाओं को संक्रमित करना शुरू कर देते हैं।[४८] इससे रोग का दूसरा चरण शुरु होता है। पी. विवैक्स और पी. ओवेल के कुछ बीजाणु यकृत को ही संक्रमित करके रुक जाते हैं और सुप्ताणु (अंग्रेजी: hypnozoites, हिप्नोज़ॉइट्स) के रूप में निष्क्रिय हो जाते हैं। ये 6 से 12 मास तक निष्क्रिय रह कर फिर अचानक अंशाणुओं के रूप में प्रकट हो जाते हैं और रोग पैदा कर देते हैं।[४९]

मलेरिया परभक्षी का मानव शरीर में जीवन चक्र। मच्छर एक गर्भवती स्त्री को संक्रमित करता है, पहले यकृत में, फिर रक्त धारा को। पहले बीजाणु रक्त धारा में प्रवेश कर यकृत पहुँचते हैं, एवं यकृत कोशिकाओं को संक्रमित, बहुगुणित होकर, कोशिकाओं को भंग करके वापस रक्त धारा में चले जते हैं। वहां लाल रक्त कोशिकाओं को संक्रमित कर वलय रूप में विकसित होते हैं। फिर और विकास कर के रक्त कोशिकाओं को भी भंग कर देते हैं। केवल वलय रूप ही रक्त धारा में दिखते हैं, अन्य सभी विकास के चरण रक्त वाहिकाओं की दीवारों से चिपके रहते हैं। कुछ अंशाणु जननाणुओं के रूप में विकसित हो जाते हैं, और फिर काटने पर मच्छर को संक्रमित कर देते हैं जहाँ मलेरिया परजीवी का जीवनचक्र पूरा होता है।
मलेरिया परभक्षी का मानव शरीर में जीवन चक्र। मच्छर एक गर्भवती स्त्री को संक्रमित करता है, पहले यकृत में, फिर रक्त धारा को। पहले बीजाणु रक्त धारा में प्रवेश कर यकृत पहुँचते हैं, एवं यकृत कोशिकाओं को संक्रमित, बहुगुणित होकर, कोशिकाओं को भंग करके वापस रक्त धारा में चले जते हैं। वहां लाल रक्त कोशिकाओं को संक्रमित कर वलय रूप में विकसित होते हैं। फिर और विकास कर के रक्त कोशिकाओं को भी भंग कर देते हैं। केवल वलय रूप ही रक्त धारा में दिखते हैं, अन्य सभी विकास के चरण रक्त वाहिकाओं की दीवारों से चिपके रहते हैं। कुछ अंशाणु जननाणुओं के रूप में विकसित हो जाते हैं, और फिर काटने पर मच्छर को संक्रमित कर देते हैं जहाँ मलेरिया परजीवी का जीवनचक्र पूरा होता है।

लाल रक्त कोशिका में प्रवेश करके ये परजीवी खुद को फिर से गुणित करते रहते हैं। ये वलय रूप में विकसित होकर फिर भोजाणु (अंग्रेजी: trophozoites, ट्रोफ़ोज़ॉइट्स) और फिर बहुनाभिकीय शाइज़ॉण्ट (अंग्रेजी: schizont) और फिर अनेकों अंशाणु बना देते हैं। समय समय पर ये अंशाणु पोषक कोशिकाओं को तोड़कर नयीं लाल रक्त कोशिकाओं को संक्रमित कर देते हैं। ऐसे कई चरण चलते हैं। मलेरिया में बुखार के दौरे आने का कारण होता है हजारों अंशाणुओं का एकसाथ नई लाल रक्त कोशिकाओं को प्रभावित करना।

मलेरिया परजीवी अपने जीवन का लगभग सभी समय यकृत की कोशिकाओं या लाल रक्त कोशिकाओं में छुपा रहकर बिताता है, इसलिए मानव शरीर के प्रतिरक्षा तंत्र से बचा रह जाता है। तिल्ली में नष्ट होने से बचने के लिए पी. फैल्सीपैरम एक अन्य चाल चलता है- यह लाल रक्त कोशिका की सतह पर एक चिपकाऊ प्रोटीन प्रदर्शित करा देता है जिससे संक्रमित रक्त कोशिकाएँ को छोटी रक्त वाहिकाओं में चिपक जाती हैं और तिल्ली तक पहुँच नहीं पाती हैं।[५०] इस कारण रक्तधारा में केवल वलय रूप ही दिखते हैं, अन्य सभी विकास के चरणों में यह छोटी रक्त वाहिकाओं की सतहों में चिपका रहता है। इस चिपचिपाहट के चलते ही मलेरिया रक्तस्त्राव की समस्या करता है।

यद्यपि संक्रमित लाल रक्त कोशिका की सतह पर प्रदर्शित प्रोटीन पीएफईएमपी1 (Plasmodium falciparum erythrocyte membrane protein 1, प्लास्मोडियम फैल्सीपैरम इरिथ्रोसाइट मैम्ब्रेन प्रोटीन 1) शरीर के प्रतिरक्षा तंत्र का शिकार बन सकता है, ऐसा होता नहीं है क्योंकि इस प्रोटीन में विविधता बहुत ज्यादा होती है।[५०] हर परजीवी के पास इसके 60 प्रकार होते है वहीं सभी के पास मिला कर असंख्य रूपों में ये इस प्रोटीन को प्रदर्शित कर सकते हैं। वे बार बार इस प्रोटीन को बदल कर शरीर के प्रतिरक्षा तंत्र से एक कदम आगे रहते हैं।

कुछ अंशाणु नर-मादा जननाणुओं में बदल जाते हैं और जब मच्छर काटता है तो रक्त के साथ उन्हें भी ले जाता है। यहाँ वे फिर से अपना जीवन चक्र पूरा करते हैं।

[संपादित करें] मलेरिया का मानव जीनोम पर प्रभाव

हाल के इतिहास में मानव जीनोम पर सबसे अधिक प्रभाव डालने वाला रोग मलेरिया ही रहा है। इसके मुख्य कारण है कि मलेरिया से बड़ी मात्रा में लोगों की मृत्यु होती है |

[संपादित करें] हंसिया-कोशिका रोग

हंसिया-कोशिका रोग की जीन का प्रसार
हंसिया-कोशिका रोग की जीन का प्रसार
मलेरिया का प्रसार
मलेरिया का प्रसार
मुख्य लेख: हंसिया-कोशिका रोग

मानव जीनोम पर मलेरिया के प्रभाव का विस्तृत अध्ययन किया गया है हंसिया-कोशिका रोग के संबंध में। इस रोग में हीमोग्लोबिन के बीटा-ग्लोबिन खंड को बनाने वाली जीन एच.बी.बी. मे उत्परिवर्तन हो जाता है। सामान्यतया बीटा ग्लोबिन प्रोटीन के छठे स्थान पर एक ग्लूटामेट अमीनो अम्ल होता है, जबकि हंसिया-कोशिका रोग में इसकी जगह वैलीन अम्ल आ जाता है। इस बदलाव से एक जलसह अमीनो अम्ल के स्थान पर जल-विरोधी अम्ल आ जाता है जिससे हीमोग्लोबिन के अणु परस्पर बंध जाने को प्रोत्साहित होते हैं। हीमोग्लोबिन अणुओं की लड़ियाँ बन जाने से विकृत लाल रक्त कोशिका हंसिया का आकार ग्रहण कर लेती हैं। इस तरह से विकृत हुई रक्त कोशिकाएँ रक्त से हटा ली जाती हैं और विनष्ट कर दी जाती हैं, मुख्यतया तिल्ली में।

मलेरिया परजीवी जब अपनी अंशाणु अवस्था में लाल रक्त कोशिका में रहता है तो अपने उपाचय से ये लाल रक्त कोशिका की आंतरिक रसायन संरचना बदल देता है। ये कोशिकाएं तब तक बची रहती है जब तक परजीवी बहुगुणित नहीं होते, किंतु यदि लाल रक्त कोशिका में हंसिया तथा सामान्य प्रकार का हीमोग्लोबिन मिले जुले रूप में होता है तो यह विकृत रूप ले लेती है तथा परजीवी का प्रजनन होने के पहले ही नष्ट कर दी जाती है। इस प्रकार जिन लोगों में हंसिया-कोशिका की केवल एक जीन होती है, उनमें सीमित मात्रा में हंसिया-कोशिका रोग के रहते वे हल्के एनीमिया से तो ग्रस्त रहते हैं किंतु उन्हें अधिक घातक रोग मलेरिया से बहुत बेहतर स्तर का प्रतिरोध मिल जाता है।

जिन लोगों में पूर्णतया विकसित हंसिया-कोशिका रोग होता है वे साधारणतया युवा अवस्था से पहले ही मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं। जिन क्षेत्रों में मलेरिया महामारी रूप में फैलता है वहाँ लगभग 10% लोगों में हंसिया-कोशिका जीन पाई जाती है। इस प्रकार के हीमोग्लोबिन के चार उपप्रकार जनसंख्या में मिलने से लगता है कि मलेरिया से बचने हेतु 4 बार अलग-अलग समय में हीमोग्लोबिन में उत्परिवर्तन हुआ था। इसके अलावा एच.बी.बी. जीन के अन्य उत्परिवर्तित रूप भी हैं जो मलेरिया के प्रति प्रतिरोधक क्षमता देते हैं। इनके प्रभाव से एच.बी.ई. तथा एच.बी.सी. प्रकार का हीमोग्लोबिन पैदा होता है जो कि क्रमशः दक्षिण पूर्व एशिया तथा पश्चिमी अफ्रीका में मिलता है।

[संपादित करें] थैलैसीमिया

मुख्य लेख: थैलैसीमिया

मलेरिया द्वारा जो अन्य उत्परिवर्तन मानव जीनोम में हुए हैं उनमें थैलैसीमिया नामक रक्त रोग भी प्रमुख है। सार्डीनिया तथा पापुआ न्यू गिनी में किये अध्ययन बताते हैं कि बीटा-थैलैसीमिया नामक जीन के वितरण का सीधा संबंध मलेरिया से पीड़ित होने की दर से होता है। लाइबेरिया में किया गया अध्ययन बताता है कि जिन बच्चों मे बीटा-थैलैसीमिया नामक जीन मौजूद था उनमे मलेरिया होने की संभावना 50% कम थी। इसी प्रकार एल्फा धनात्मक प्रकार के एल्फा-थैलैसीमिया मामलों में भी मलेरिया की दर कम पायी जाती है। संभवत ये सभी जीन मानव विकास के दौरान मलेरिया से प्रतिरोधक क्षमता देने के कारण चयनित हुई हैं।

[संपादित करें] डफ़ी एंटीजन

मुख्य लेख: डफ़ी एंटीजन

डफ़ी एंटीजन वे एंटीजन होते है जो लाल रक्त कोशिका तथा शरीर की अन्य कोशिकाओं पर